शुक्रवार, 7 जून 2013

छत्तीसगढ- ऊँठ के करवट बदलने का इंतजार


                                          
         आज की जिस खबर को सभी अखबारों ने प्रमुखता से  उठाया है उसका अनुमान हमने 26 तारिख को हमले के दुसरे दिन ही लगा लिये थे कि अब छत्तीसगढ का कुछ नही हो सकता । छत्तीसगढ एक छोटा सा राज्य है जो केवल 27 जिलों, 90 विधान सभा  औऱ 11 लोकसभा सीटों में ही सिमटा हुआ है । यहां की अकूत खनिज संपदा के कारण हर पार्टी के लिये यह दुधारू गाय की तरह है जिसे तब तक दुहा जाता है जब तक कोई कडा विरोध ना हो या फिर सरकार ना बदल जाए । जब मध्यप्रदेश से अलग हुआ तो तात्कालिन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की उपेक्षा के कारण छत्तीसगढ वासियों के लिये उनके दिल मे नफरत भरी हुई थी, जो आज भी पुराने कांग्रेसियों के दिल मे भरी हुई है । उसकी कोई एक वजह नही अनेकों वजहें रही हैं जिनमें मुख्य रूप से छत्तीसगढ द्वारा बिजली उत्पादन करने के बाद भी यहां पर किसानों को बिजली उपलब्ध ना होना , निःशुल्क बोर खनन के समय पूरे छत्तीसगढ मे केवल 8 जगह बोर किये गए थे इसके अलावा खराब सडकें और अव्यवस्थाएं जो आज भी मध्यप्रदेश की बदहाली का जिम्मेदार दिग्विजय को मानती हैं ।
                                                  जब अलग छत्तीसगढ राज्य बना तो वह अजीत जोगी जिससे पूरी प्रदेश की जनता अपरिचित थी अचानक मुख्यमंत्री बना दिये गए और उनका भी तीन साल का शासन काल जनता को डरा रहा है । फिर आई भाजपा सरकार औऱ पहले पांच साल तो ठिक ठाक गुजर गए लेकिन उसके बाद जो इनका व्यवसायिक करण देखने को मिल रहा है उसकी तुलना मे लोग आज अजीत जोगी को बेहतर समझने लगे हैं । जोगी काल मे कई ऐसे कार्य किये गए जो आज दस साल के कार्यकाल मे भाजपा सरकार नही कर सकी है । उन्होने सबसे उल्लेखनीय कार्य जो किये वह थे नक्सल ना बढने पाए इसके लिये आदिवासीयों को पूरी सहूलियत , सभी जगह पक्की सडकें, 24 घंटे बिजली और सबसे बडी चीज चुस्त प्रशासनिक व्यवस्थाएं जिसमे केवल जोगी जी का नाम लेने भर से गरीबों के भी काम हो जाया करते थे ।
                                                 अब 25 मई को हुए दरभा कांड की बात करते हैं जिसने पूरे प्रदेश की राजनीती को प्रभावित कर दिया । दरभा कांड की जड मे है स्थानीय आदिवासीयों व ग्रामीणों का शोषण । भाजपा सरकार की देन झरियामारी कांड जिसमे कांकेर जिले की आदिवासी छात्राओं के साथ तीन साल से ज्यादा समय तक बलात्कार होते रहा , कांग्रेस ने हल्ला गुल्ला सब कुछ मचाने की योजना बनाई लेकिन अंत क्या हुआ .... सब कुछ शांत ... दरभा हमले के बाद नक्सलियों के एक बयान मे यह भी कहा गया था कि कांग्रेस विपक्ष की सही भूमिका नही निभा रही है और यह सच्चाई भी है । प्रदेश के सारे नेता रमन सरकार का इस तरह से बचाव करते है मानो वह स्वयं सरकार के मंत्री हों ...सलवा जुडुम की आड मे भरपूर अत्याचार हुए हैं और हमारे सूत्रों की मानें तो सभी ग्रामीण सरकार के खिलाफ हथियार उठाने को तैय्यार हैं । 
                                                आज का एक बयान नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे का पढने को मिला जिसमे उन्होने कहा कि हम तीनों (स्वयं चौबे, स्व. नंद कुमार पटेल और चरण दास महंत ) दिग्विजय सिंह के द्वारा गढे गए हैं । इस बयान से ये बात स्पष्ट होती है कि छत्तीसगढ मे अब तीन ताकतें अपने अपने पत्ते चलाएंगे जिनमे नंबर 1 पर अजीत जोगी हैं  दुसरे नंबर पर - मोतीलाल वोरा और 3 नंबर के दावेदार दिग्विजय सिंह होंगे ।
अजीत जोगी - हर  मोर्चे को बखूबी संभालने की  समझ रखते हैं लेंकिन जनता इनके नाम पर वोट नही देगी 
मोतीलाल वोरा - दस जनपथ के करीबी होने के अलावा कोई उपलब्धी नही है स्वयं भी चुनाव हार चुके हैं
दिग्विजय सिंह - पुराना भूत जागेगा और इन्हे जनता किसी हालत मे स्वीकार नही करेगी ।      
                                                     चौबे के बयान के पहले तक छत्तीसगढ की तिकडी को वोरा खेमे से जोडकर देखा जाता था लेकिन राजनीती मे सब कुछ संभव हो सकता है । लेकिन एक ठोस कदम कांग्रेस उठाती है तो उसकी वापसी पूरे जोर शोर से हो सकती है ।
                                                                            मेरा व्यक्तिगत विचार व सलाह ये है कि  जिस तरह से कांग्रेस ने अजीत जोगी को अचानक लाकर मुख्यमंत्री पद पर बैठा दी थी उसी तरह से छत्तीसगढ के प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता शैलेष नितीन त्रेवेदी को भी बडी जिम्मेदारी देनी चाहिये । शैलेष नितीन एक ऐसे कर्मठ व लोकप्रिय व्यक्ति है जो निर्विवादित छबी के हैं औऱ उनकी बेहतरीन कला सभी लोगों को साथ लेकर चलने की है । वह एक मजबूत व जमीन से जुडे हुए हैं साथ ही जोगी शासनकाल मे उनकी काबिलियत हर किसी ने देखी है । उन्हे हर छोटा बडा नेता सम्मान  देता है और कोई भी ऐसा व्यक्ति जो छत्तीसगढ प्रदेश की भलाई के बारे मे सोचता होगा वह इस नाम को खारिज नही कर सकता  । इस समय जबकि हर कांग्रेसी को भाजपा के साथ मिला हुआ माना जाता है यह एक ऐसे व्यक्ति रहे हैं जो हर मुद्दे पर भाजपा को बेहतरीन रणनीती के साथ घेरने का प्रयास किये थे किंतु बाकि नेताओं को जहां बोलना चाहिये या काम करना चाहिये वहां से भी नदारद रहते हैं और त्रिवेदी को संगठन के बडे नेताओं से सपोर्ट ना मिलने के कारण भाजपा अभी तक टिकी हुई है  ।  बात चाहे नक्सलियों की हो या फिर भ्रष्टाचार की , जनता की हो या किसानों की इन्होने हर मुद्दे पर बात रखे थे ।
...                                        लेकिन मेरे विचार से क्या फर्क पडेगा  यह बाद की बात है पहले तो ये देखना होगा कि क्या अजीत जोगी कांग्रेस से बगावत कर सकते हैं ? देखें ऊँठ किस करवट बैठता है ...तब तक इंतजार करते हैं ।                             
 

शनिवार, 25 मई 2013

छत्तीसगढ मे तत्काल राष्ट्रपति शासन लगाया जाय ।

इस दर्दनाक घटना के बाद रमन सरकार से इस्तीफा मांगना या कोई दुसरी बातें करना व्यर्थ है । प्रदेश मे भारी अराजकता फैल चुकी है , इंसाफ नाम की चीज यहां पर है ही नही । तीन दिन पहले सुरक्षाबलों के द्वारा निर्दोष 3 बच्चों सहित ग्रामीणों को मारा गया था । हमारा संगठन चुप रहा क्योंकि छत्तीसगढ में  मानवाधिकार संगठन जब कभी भी निर्दोष ग्रामीणों को नक्सली के नाम पर मारपा जाता है यह बात कहते तो उन पर नक्सली समर्थक का ठप्पा लगा कर भाजपा सरकार उसे निपटाने पर भिड जाती है । लेकिन आज का यह नक्सली हमला अकेले नक्सलियों ने नही बल्कि ग्रामीणों के साथ मिलकर किया गया हमला था । इस हमले के शिकार कांग्रेसी इसलिये बने क्योंकि कल के अखबार की मुख्य खबर थी हमारे मुख्यमंत्री रमन सिंह की ओर से की नक्सली कांग्रेस को समर्थन करते हैं इसलिये कांग्रेस शासित राज्यों मे नक्सली नही होते हैं इसलिये उन्होने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को सुरक्षा बल तक मुहैय्या कराना उचित नही समझे ।   आज नक्सलीयों के हमले के बाद मुख्यमंत्री किस दल को नक्सली समर्थक कहेंगे ।
                                                             महेंद्र कर्मा पिछले पांच साल से नक्सलियों के निशाने पर थे उनके परिवार पर आए दिन हमले होते रहते थे फिर भी राज्य सरकार का इस तरह से सूरक्षा मे चूक करना किसी भी हालत मे स्वीकार्य नही होगा कि उनके पास सुरक्षाबलों की कमी थी । जिस विकास यात्रा का ढकोसला  लेकर पूरे राज्य मे ढिंढोरा पीटा जा रहा था उसकी पोल आज कई कांग्रेसियों ने अपनी जान देकर खोली है  । महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार की मौत आने वाले चुनाव मे कांग्रेस के लिये अपूरणीय क्षती के रूप मे सामने आएगी । चुनावी मामलों से दूर रहते हुए मानवाधिकार के दृष्टिकोंण से देखा जाय तो छत्तीसगढ की भाजपा के द्वारा की जा रही मनमानी का परिणाम है ये हत्याएं । हम राज्यपाल,  भारत सरकार और माननीय राष्ट्रपति महोदय से यह अपील करते हैं  कि वह बगैर देर किये छत्तीसगढ मे राष्ट्रपति शासन लगा कर हालात को अपने काबू मे करे ।
                                                
 
                            

शुक्रवार, 10 मई 2013

छत्तीसगढ मे स्वाइन फ्लू , सरकार के सौजन्य से है ।

 इस चेतावनी    वाले बैनर को छत्तीसगढ IHRO द्वारा दिनांक 26 मार्च 2013 को जारी किया गया था । ना केवल जारी करवाया गया बल्कि इस  संबंध मे  IHRO मुख्यालय- नई दिल्ली , स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं , समाज सेवकों तथा कांग्रेसी नेताओं से भी सहायता मांगी गई औऱ हम सभी के संयुक्त प्रयास के बाद भी सरकार के द्वारा आदिवासी क्षेत्रों मे बीमार पशुओं का वितरण कर दिया गया । चूँकि सूवर तो देखने से ही संक्रमित लग रहे थे इसलिये इस बात की भी पूरी संभावना थी कि उनसे यह बीमारी साथ के अन्य जानवरों जिनमें बैल व बकरे भी थे उन तक भी पहुँची होगी जिससे यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ की सरकार ने निःशुल्क पशु वितरण की आड में आदिवासी जिंदगीयों को खत्म करने का कितना आसान लेकिन   घिनौना खेल खेला है ।  केंद्र की  योजना के आड मे भाजपा सरकार अपना नाम कमाना चाह रही है लेकिन बदले मे मासूम आदिवासीयों की जान से खिलवाड कर रही है ।
                                                    जब इन बीमार जानवरो को कांकेर ले जाया गया था तो वहां के पशु विभाग ने बांटने से ये कहते हुए मना कर दिया कि इनमे स्वाइन फ्लू के प्रारंभिक लक्षण दिख रहे है इसके बाद जानकारी मिली कि नारायणपुर से इन पशुओं के स्वस्थ होने का सर्टिफेकेट जारी कर दिया गया है । विश्वसनीय सूत्रों की माने तो निःशुल्क पशु वितरण का सारा खेल 26 से 30 तारिख के बीच मे खेला गया है और यह सारा वितरण सरगुजा औऱ बस्तर संभाग के जंगली क्षेत्रों मे ही हुआ है ।
 
                                                       चूँकि 26 मार्च को होलीका दहन की रात थी और उसी दिन उन्हे इसलिये बंटवाया गया ताकि गाँव वाले उन्हे मार कर खा लें और   ये बताया जाएगा  कि हमने पशुओं को निःशुल्क बांट दिये हैं । तारिखों और दस्तावेजों में तारीखों कैसे खिलवाड होता है  ये आज किसी से भी छुपा नही है । IHRO को जैसे ही इस इस घिनौनी साजिश की सूचना अपने बस्तर संभाग के संयोजक कमल शुक्ला (वरिष्ठ पत्रकार , कांकेर) से दोपहर 3 बजे प्राप्त हुई,  हम लोग तत्काल उनके पीछे पड गए । हमारे सुरही, नरहरपुर के ग्रामीण कार्यकर्ता होली के अपने कार्यक्रम को छोडकर तुंरत इन गाडीयों के पीछे लग गए लेकिन ये उनकी गाडीयां उन क्षेत्र से बाहर  जंगलो के भीतर चली गई । 
                                                इसके बाद हमारे संगठन के द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता  श्री सचिन  अवस्थी, श्री अमित जोगी तथा कांग्रेस प्रवक्ता श्री शैलेष नितीन त्रिवेदी जी को पूरे घटनाक्रम की फोन पर जानकारी देते हुए सहयोग की सहयोग की अपील की गई ।  इनसे  शाम 6.30 बजे सहायता मांगी गई जिसके बाद उस क्षेत्र के सभी सामाजिक  व कांग्रेसी कार्यकर्तओं ने घेराबंदी शुरू कर दी । श्री शैलेष नितीन जी ने बताए कि इस संबंध मे स्वास्थ्य अधिकारीयों से उन्होने जानकारी मंगवाए हैं लेकिन उन लोगों के द्वारा छुट्टी का बहाना बना दिया गया है , वहीं दुसरी ओर वही पशुविभाग छट्टी के दिन पशु वितरण कर रहा था वह भी रात को ।  रात 8.30 बजे कांकेर के अमीन मेमन ( पूर्व युवक कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष ) द्वारा ये सूचना मिली कि श्री  अमित जोगी नें यहां के पूरे घटनाक्रम पर नियंत्रण करने के लिये उन्ही से कहा है और वे लोग ऐसे ऐसे क्षेत्रों मे उस गाडी की तलाश में थे जहां मोबाइल काम नही करते हैं, इसलिये ये सूचना देर से प्राप्त हुई कि उन गाडी वालों ने रास्ते मे जो भी आदमी दिखता था उसे जानवर पकडा कर और नाम पता दस्तखत लेकर आगे बढते चले गए हैं और उन्हे वह गाडी धमतरी मे खाली मिली है ।
                                                        दरअसल इस घिनौने खेल के पीछे केन्द्र सरकार के वह पैसे है जो निःशुल्क पशु वितरण के लिये राज्य को मिले थे लेकिन योजना पूरी नही होने के कारण वह रकम 31 मार्च को   वापस हो जाती । उस रकम के साथ साथ ऐसा संदेह भी होता है कि राज्य सरकार ने आदिवासीयों को मारने के लिये ही स्वाइन फ्लू ग्रसित पशुओं का वितरण करवाई है और यह संक्रमण बढने पर इसके इलाज के नाम पर अरबों रूपये कमाने का फिर से खेल कर लिया जाए । राज्य सरकार चाहे जितने सबूत मिटा ले  लेकिन हम लोग इस बात के गवाह है कि यह भाजपा सरकार किस दुर्दांतपूर्ण ढंग से काम कर रही है ।
                                                    हद तो ये हो गई है कि आदिवासी क्षेत्रों से इलाज के लिये आने वाले लोगों का राज्य के सरकारी अस्पतालों मे इस डर से  इलाज ही किया जा रहा है कि कहिं वह स्वाइन फ्लू से पीडित ना हो । प्रदेश मे स्वाइन फ्लू अपने विकराल मे अभी आने को है और हो सकता है कि इसमे यहां के नेताओं के परिवार वाले भी निपट जाएं, क्योंकि यह एक छोटा सा राज्य है औऱ हर किसी का एक दुसरे शहरों मे आना जाना लगा ही रहता है । अब देखने वाली बात ये है कि स्वाइन फ्लू से निपटने के लिये भाजपा सरकार कितने रूपयों की मांग करती है क्योंकि मौत का यह सारा खेल पैसे के लिये ही तो हुआ है ।
 और अंत मे आज के अखबार की वो कतरन जो हमारे स्वाइन फ्लू के पूर्वानुमान को सत्य करती है -
दिनांक - 10 मई 2013 को रायपुर नई दुनिया अखबार मे प्रकाशित समाचार

संबंधित लिंक भी देख सकते हैं जो पूर्व रायगढ सांसद पुष्पादेवी सिंह ने कही हैं आदिवासी खा रहे हैं सूअर का मांस: पुष्पादेवी

शनिवार, 23 मार्च 2013

कैंसर पीडित प्राध्यापक की वेदना संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची ।


 ये मेडिकल सर्टीफिकेट पी.जी. कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय , बिलासपुर के प्राध्यापक डॉ. एस.सी. शुक्ला का है जिन्हे मेडिकल डॉक्टरों के द्वारा चेकअप करने के पश्चात कोशिका कैंसर से पीडित पाते हुए उन्हे यह सर्टिफिकेट दिया था । इस मेडिकल सर्टिफिकेट को जारी करने की तिथी है 7 अप्रेल 2012 । यह एक वर्ष की वैधता वाला है तथा इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि छ.ग. शासन कि परिपत्र क्रमांक 2-39/93/17 मेडि. 4 दिनांक 10.11.1995 के अनुसार लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों के उपचार में द्वितीय अभिमत से छूट दी गई है । 
                             अब जबकि इन्हे कैंसर है औऱ इनका नियमित इलाज अपोलो अस्पताल में चल रहा है, इसके बाद भी छत्तीसगढ शासन के उच्च शिक्षा विभाग के द्वारा 30 जुलाई 2012 को स्थानांतरण आदेश दे दिया जाता है और इनका ट्रांसफर बिलासपुर से बाहर शास. महाविद्यालय पंडरिया, जिला कबीर धाम कर दिया गया । स्थानांतरण के बाद भी सरकार के अन्याय की इंतेहा खत्म नही हुई , बल्कि उसी सूची में इनकी धर्म पत्नी श्रीमती अर्चना शुक्ला का स्थानांतरण भी शास. राजीव गांधी महाविद्यालय लोरमी जिला मुंगेली कर दिया गया । नियमों के अनुसार यदि पति पत्नी एक ही विभाग में कार्यरत हों तो उनका स्थानांतरण एक साथ- एक ही स्थान पर किया जाता है जबकि इस मामले में नियमों की पूरी तरह से अनदेखी की गई है ।
                      डॉ. एस.सी. शुक्ला की पत्नी व इनके छोटे भाई कमल शुक्ला के द्वारा कई बार मुख्य सचिव, शिक्षा विभाग सहित मुख्यमंत्री के पास निवेदन दिया गया , यहां तक की मुख्यमंत्री के जनदर्शन में भी यह अपनी बात रख आए किंतु 7-8 माह बीत जाने के बाद भी सरकार द्वारा कोई सुध नही ली गई ।
                     
                       डॉ. शुक्ला का मामला इनके छोटे भाई कमल शुक्ला के द्वारा IHRO छत्तीसगढ के सामने रखा गया । मामले की शुरूआती बातों को जानने के बाद यह समझ में आया कि सरकार अपना रवैय्या नही बदलने वाली है अतः मेरे द्वारा यह मामला अपने मुख्यालय के समक्ष भेज दिया गया ।
                             मुख्यालय द्वारा मांगी गई सारी जानकरी उन्हे उपलब्ध करा दी गई जिसके बाद IHRO के राष्ट्रीय सचिव अनुराग ज्योति के द्वारा मामले को एमनेस्टी इंटरनेशनल, राष्ट्रीय  मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली भेजा गया  , किंतु मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी एक प्रति संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद के मुख्यालय जिनेवा , स्विटजरलैंड  भी भेज दी गई है ।  संभवतः पूरे छत्तीसगढ की यह पहली शिकायत है जो संयुक्त राष्ट्र मा.अ. परिषद को भेजी गई है किंतु यही एक शिकायत पूरे छत्तसीगढ के लोगों को उनके मानव अधिकार के बारे मे जागृत करने के साथ साथ सरकार को भी चेतावनी दे सकती है कि लोकतंत्र की सरकारों को विश्व समुदाय के बनाये नियमों के अनुसार चलना चाहिये अन्यथा भविष्य में इसके दुष्परिणाम झेलने पड सकते हैं