इस दर्दनाक घटना के बाद रमन सरकार से इस्तीफा मांगना या कोई दुसरी बातें करना व्यर्थ है । प्रदेश मे भारी अराजकता फैल चुकी है , इंसाफ नाम की चीज यहां पर है ही नही । तीन दिन पहले सुरक्षाबलों के द्वारा निर्दोष 3 बच्चों सहित ग्रामीणों को मारा गया था । हमारा संगठन चुप रहा क्योंकि छत्तीसगढ में मानवाधिकार संगठन जब कभी भी निर्दोष ग्रामीणों को नक्सली के नाम पर मारपा जाता है यह बात कहते तो उन पर नक्सली समर्थक का ठप्पा लगा कर भाजपा सरकार उसे निपटाने पर भिड जाती है । लेकिन आज का यह नक्सली हमला अकेले नक्सलियों ने नही बल्कि ग्रामीणों के साथ मिलकर किया गया हमला था । इस हमले के शिकार कांग्रेसी इसलिये बने क्योंकि कल के अखबार की मुख्य खबर थी हमारे मुख्यमंत्री रमन सिंह की ओर से की नक्सली कांग्रेस को समर्थन करते हैं इसलिये कांग्रेस शासित राज्यों मे नक्सली नही होते हैं इसलिये उन्होने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को सुरक्षा बल तक मुहैय्या कराना उचित नही समझे । आज नक्सलीयों के हमले के बाद मुख्यमंत्री किस दल को नक्सली समर्थक कहेंगे ।
महेंद्र कर्मा पिछले पांच साल से नक्सलियों के निशाने पर थे उनके परिवार पर आए दिन हमले होते रहते थे फिर भी राज्य सरकार का इस तरह से सूरक्षा मे चूक करना किसी भी हालत मे स्वीकार्य नही होगा कि उनके पास सुरक्षाबलों की कमी थी । जिस विकास यात्रा का ढकोसला लेकर पूरे राज्य मे ढिंढोरा पीटा जा रहा था उसकी पोल आज कई कांग्रेसियों ने अपनी जान देकर खोली है । महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार की मौत आने वाले चुनाव मे कांग्रेस के लिये अपूरणीय क्षती के रूप मे सामने आएगी । चुनावी मामलों से दूर रहते हुए मानवाधिकार के दृष्टिकोंण से देखा जाय तो छत्तीसगढ की भाजपा के द्वारा की जा रही मनमानी का परिणाम है ये हत्याएं । हम राज्यपाल, भारत सरकार और माननीय राष्ट्रपति महोदय से यह अपील करते हैं कि वह बगैर देर किये छत्तीसगढ मे राष्ट्रपति शासन लगा कर हालात को अपने काबू मे करे ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें