इस चेतावनी वाले बैनर को छत्तीसगढ IHRO द्वारा दिनांक 26 मार्च 2013 को जारी किया गया था । ना केवल जारी करवाया गया बल्कि इस संबंध मे IHRO मुख्यालय- नई दिल्ली , स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं , समाज सेवकों तथा कांग्रेसी नेताओं से भी सहायता मांगी गई औऱ हम सभी के संयुक्त प्रयास के बाद भी सरकार के द्वारा आदिवासी क्षेत्रों मे बीमार पशुओं का वितरण कर दिया गया । चूँकि सूवर तो देखने से ही संक्रमित लग रहे थे इसलिये इस बात की भी पूरी संभावना थी कि उनसे यह बीमारी साथ के अन्य जानवरों जिनमें बैल व बकरे भी थे उन तक भी पहुँची होगी जिससे यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ की सरकार ने निःशुल्क पशु वितरण की आड में आदिवासी जिंदगीयों को खत्म करने का कितना आसान लेकिन घिनौना खेल खेला है । केंद्र की योजना के आड मे भाजपा सरकार अपना नाम कमाना चाह रही है लेकिन बदले मे मासूम आदिवासीयों की जान से खिलवाड कर रही है ।
जब इन बीमार जानवरो को कांकेर ले जाया गया था तो वहां के पशु विभाग ने
बांटने से ये कहते हुए मना कर दिया कि इनमे स्वाइन फ्लू के प्रारंभिक लक्षण
दिख रहे है इसके बाद जानकारी मिली कि नारायणपुर से इन पशुओं के स्वस्थ
होने का सर्टिफेकेट जारी कर दिया गया है । विश्वसनीय सूत्रों की माने तो निःशुल्क पशु वितरण का सारा खेल 26 से 30 तारिख के बीच मे खेला गया है और यह सारा वितरण सरगुजा औऱ बस्तर संभाग के जंगली क्षेत्रों मे ही हुआ है ।
चूँकि 26 मार्च को होलीका दहन की रात थी और उसी दिन उन्हे इसलिये बंटवाया गया ताकि गाँव वाले उन्हे मार कर खा लें और ये बताया जाएगा कि हमने पशुओं को निःशुल्क बांट दिये हैं । तारिखों और दस्तावेजों में तारीखों कैसे खिलवाड होता है ये आज किसी से भी छुपा नही है । IHRO को जैसे ही इस इस घिनौनी साजिश की सूचना अपने बस्तर संभाग के संयोजक कमल शुक्ला (वरिष्ठ पत्रकार , कांकेर) से दोपहर 3 बजे प्राप्त हुई, हम लोग तत्काल उनके पीछे पड गए । हमारे सुरही, नरहरपुर के ग्रामीण कार्यकर्ता होली के अपने कार्यक्रम को छोडकर तुंरत इन गाडीयों के पीछे लग गए लेकिन ये उनकी गाडीयां उन क्षेत्र से बाहर जंगलो के भीतर चली गई ।
इसके बाद हमारे संगठन के द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता श्री सचिन अवस्थी, श्री अमित जोगी तथा कांग्रेस प्रवक्ता श्री शैलेष नितीन त्रिवेदी जी को पूरे घटनाक्रम की फोन पर जानकारी देते हुए सहयोग की सहयोग की अपील की गई । इनसे शाम 6.30 बजे सहायता मांगी गई जिसके बाद उस क्षेत्र के सभी सामाजिक व कांग्रेसी कार्यकर्तओं ने घेराबंदी शुरू कर दी । श्री शैलेष नितीन जी ने बताए कि इस संबंध मे स्वास्थ्य अधिकारीयों से उन्होने जानकारी मंगवाए हैं लेकिन उन लोगों के द्वारा छुट्टी का बहाना बना दिया गया है , वहीं दुसरी ओर वही पशुविभाग छट्टी के दिन पशु वितरण कर रहा था वह भी रात को । रात 8.30 बजे कांकेर के अमीन मेमन ( पूर्व युवक कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष ) द्वारा ये सूचना मिली कि श्री अमित जोगी नें यहां के पूरे घटनाक्रम पर नियंत्रण करने के लिये उन्ही से कहा है और वे लोग ऐसे ऐसे क्षेत्रों मे उस गाडी की तलाश में थे जहां मोबाइल काम नही करते हैं, इसलिये ये सूचना देर से प्राप्त हुई कि उन गाडी वालों ने रास्ते मे जो भी आदमी दिखता था उसे जानवर पकडा कर और नाम पता दस्तखत लेकर आगे बढते चले गए हैं और उन्हे वह गाडी धमतरी मे खाली मिली है ।
दरअसल इस घिनौने खेल के पीछे केन्द्र सरकार के वह पैसे है जो निःशुल्क पशु वितरण के लिये राज्य को मिले थे लेकिन योजना पूरी नही होने के कारण वह रकम 31 मार्च को वापस हो जाती । उस रकम के साथ साथ ऐसा संदेह भी होता है कि राज्य सरकार ने आदिवासीयों को मारने के लिये ही स्वाइन फ्लू ग्रसित पशुओं का वितरण करवाई है और यह संक्रमण बढने पर इसके इलाज के नाम पर अरबों रूपये कमाने का फिर से खेल कर लिया जाए । राज्य सरकार चाहे जितने सबूत मिटा ले लेकिन हम लोग इस बात के गवाह है कि यह भाजपा सरकार किस दुर्दांतपूर्ण ढंग से काम कर रही है ।
हद तो ये हो गई है कि आदिवासी क्षेत्रों से इलाज के लिये आने वाले लोगों का राज्य के सरकारी अस्पतालों मे इस डर से इलाज ही किया जा रहा है कि कहिं वह स्वाइन फ्लू से पीडित ना हो । प्रदेश मे स्वाइन फ्लू अपने विकराल मे अभी आने को है और हो सकता है कि इसमे यहां के नेताओं के परिवार वाले भी निपट जाएं, क्योंकि यह एक छोटा सा राज्य है औऱ हर किसी का एक दुसरे शहरों मे आना जाना लगा ही रहता है । अब देखने वाली बात ये है कि स्वाइन फ्लू से निपटने के लिये भाजपा सरकार कितने रूपयों की मांग करती है क्योंकि मौत का यह सारा खेल पैसे के लिये ही तो हुआ है ।
और अंत मे आज के अखबार की वो कतरन जो हमारे स्वाइन फ्लू के पूर्वानुमान को सत्य करती है -
दरअसल इस घिनौने खेल के पीछे केन्द्र सरकार के वह पैसे है जो निःशुल्क पशु वितरण के लिये राज्य को मिले थे लेकिन योजना पूरी नही होने के कारण वह रकम 31 मार्च को वापस हो जाती । उस रकम के साथ साथ ऐसा संदेह भी होता है कि राज्य सरकार ने आदिवासीयों को मारने के लिये ही स्वाइन फ्लू ग्रसित पशुओं का वितरण करवाई है और यह संक्रमण बढने पर इसके इलाज के नाम पर अरबों रूपये कमाने का फिर से खेल कर लिया जाए । राज्य सरकार चाहे जितने सबूत मिटा ले लेकिन हम लोग इस बात के गवाह है कि यह भाजपा सरकार किस दुर्दांतपूर्ण ढंग से काम कर रही है ।
हद तो ये हो गई है कि आदिवासी क्षेत्रों से इलाज के लिये आने वाले लोगों का राज्य के सरकारी अस्पतालों मे इस डर से इलाज ही किया जा रहा है कि कहिं वह स्वाइन फ्लू से पीडित ना हो । प्रदेश मे स्वाइन फ्लू अपने विकराल मे अभी आने को है और हो सकता है कि इसमे यहां के नेताओं के परिवार वाले भी निपट जाएं, क्योंकि यह एक छोटा सा राज्य है औऱ हर किसी का एक दुसरे शहरों मे आना जाना लगा ही रहता है । अब देखने वाली बात ये है कि स्वाइन फ्लू से निपटने के लिये भाजपा सरकार कितने रूपयों की मांग करती है क्योंकि मौत का यह सारा खेल पैसे के लिये ही तो हुआ है ।
और अंत मे आज के अखबार की वो कतरन जो हमारे स्वाइन फ्लू के पूर्वानुमान को सत्य करती है -
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| दिनांक - 10 मई 2013 को रायपुर नई दुनिया अखबार मे प्रकाशित समाचार |
संबंधित लिंक भी देख सकते हैं जो पूर्व रायगढ सांसद पुष्पादेवी सिंह ने कही हैं आदिवासी खा रहे हैं सूअर का मांस: पुष्पादेवी

Nice Work IHRO CHHATTISGARH.
जवाब देंहटाएंwww.ihroglobal.org
Thanks sir, आपके मार्गदर्सन के बिना यह सब संभव नही हो सकता था ।
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